पुरुषों के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण मामलों पर चिंता
झूठी FIR से बचने के लिए क्या करें?
विवाद में झूठे ‘छेड़छाड़’ के आरोप: क्या है कानूनी सुरक्षा कवच ?
लखनऊ। अक्सर देखा जाता है कि जब पड़ोसियों या दो पक्षों के बीच कोई गंभीर विवाद या झगड़ा होता है, तो महिलाओं द्वारा विरोधी पक्ष के पुरुषों पर यौन उत्पीड़न या छेड़छाड़ (IPC की धारा 354) जैसे गंभीर आरोप लगा दिए जाते हैं। यह प्रवृत्ति एक गंभीर सामाजिक और कानूनी चुनौती बन गई है, जहां व्यक्तिगत रंजिश निपटाने के लिए कठोर कानूनों का दुरुपयोग किया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या भारतीय न्याय व्यवस्था में पुरुषों के लिए ऐसी कोई ठोस ‘व्यवस्था’ है, जो उन्हें इन झूठे और दुर्भावनापूर्ण मामलों से तुरंत बचा सके?
कानून का दुरुपयोग: एक बढ़ती हुई समस्या
महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून, जैसे कि आईपीसी की धारा 354, 354ए (यौन उत्पीड़न), और 509 (शब्द, हावभाव या कार्य से अपमान), अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। …लेकिन सामाजिक झगड़ों में इन कानूनों का इस्तेमाल अक्सर दबाव बनाने, समझौता कराने या बदला लेने के औजार के रूप में किया जाता है।
एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने बताया, “हमें ऐसे कई मामले मिलते हैं जहाँ मामूली संपत्ति विवाद या पार्किंग झगड़े को तुरंत ‘छेड़छाड़’ का रूप दे दिया जाता है। चूँकि ये धाराएँ संज्ञेय (Cognizable) और गैर-जमानती (Non-Bailable) हो सकती हैं, पुलिस तुरंत कार्रवाई करती है, जिससे आरोपी पुरुष को भारी सामाजिक कलंक और कानूनी परेशानी झेलनी पड़ती है, भले ही वह बाद में निर्दोष साबित हो जाए।

“पुरुषों के लिए कानूनी बचाव का रास्ता”
हालांकि ‘झूठे आरोप’ रोकने के लिए कोई सिंगल “पूर्व-व्यवस्था” नहीं है, भारतीय कानून और न्यायिक प्रक्रियाओं में पुरुषों को खुद को बचाने के लिए कई महत्वपूर्ण उपाय प्रदान किए गए हैं:| कानूनी बचाव का उपाय | प्रासंगिक धारा | विवरण |
1. एफआईआर रद्द कराना | CrPC की धारा 482 | अगर एफआईआर दुर्भावनापूर्ण इरादे से या झूठे तथ्यों पर आधारित है, तो आरोपी सीधे उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर एफआईआर को रद्द करने (Quashing) की मांग कर सकता है।
2. अग्रिम जमानत | CrPC की धारा 438 | गिरफ्तारी से पहले जमानत के लिए आवेदन करना। यह उपाय तुरंत गिरफ्तारी और पुलिस हिरासत से बचाता है। अदालत को प्रथम दृष्टया केस की सच्चाई पर विचार करना होता है।
3. सबूत जुटाना | CrPC की धारा 91 | आरोपी व्यक्ति अपने निर्दोष होने के समर्थन में निर्णायक सबूत, जैसे CCTV फुटेज, डिजिटल संचार रिकॉर्ड, या घटना के समय की “लोकेशन हिस्ट्री” तुरंत जुटाकर पुलिस/न्यायालय के समक्ष पेश कर सकता है।
4. मुआवजे का दावा | CrPC की धारा 250 | यदि व्यक्ति न्यायिक प्रक्रिया के बाद झूठे मामले में बरी हो जाता है, तो वह शिकायतकर्ता से दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के लिए मुआवजा (Compensation) मांग सकता है।
5. प्रति-शिकायत/मानहानि | IPC की धारा 182, 211, 499/500 | झूठी शिकायत दर्ज कराने के लिए महिला के खिलाफ शिकायत या मानहानि का दीवानी (Civil) अथवा आपराधिक (Criminal) मुकदमा दायर किया जा सकता है।
न्यायिक हस्तक्षेप और सुप्रीम कोर्ट की चिंता
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने भी कई फैसलों में यह माना है कि कुछ कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है। विशेष रूप से घरेलू विवादों से जुड़े मामलों (जैसे IPC 498A) में, कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिए हैं कि वे केवल आरोपों के आधार पर तत्काल गिरफ्तारी न करें। न्यायालयों ने बार-बार कहा है कि कानून का उद्देश्य सुरक्षा देना है, न कि निजी प्रतिशोध का माध्यम बनना।न्यायविदों का मानना है कि पुलिस जांच अधिकारियों को भी प्रारंभिक जांच में “छेड़छाड़” जैसे आरोपों की प्रकृति और पृष्ठभूमि (जैसे कि पड़ोसी विवाद) की अधिक सावधानी से जांच करनी चाहिए, ताकि बेकसूर लोगों पर झूठे मामले दर्ज होने से रोका जा सके।
तत्काल कदम: क्या करें जब झूठा आरोप लगे?
किसी भी पुरुष के लिए जिस पर झूठा आरोप लगा हो, ये कदम तत्काल आवश्यक हैं:
- शांत रहें: आवेश में आकर कोई भी प्रतिक्रिया या धमकी न दें, क्योंकि यह आपके खिलाफ सबूत बन सकता है।
- कानूनी सलाह: तुरंत एक अनुभवी आपराधिक वकील से संपर्क करें।
- दस्तावेज़ीकरण: घटना से संबंधित सभी सबूत, गवाहों के नाम और संपर्क विवरण, और अन्य प्रासंगिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखें।
- जाँच में सहयोग: पुलिस जाँच में सहयोग करें, लेकिन वकील की सलाह पर ही कोई बयान दें।
निष्कर्षतः, झूठे आरोपों से बचाव के लिए कानून में रास्ते हैं, लेकिन पुरुष को अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए मजबूत कानूनी रणनीति और धैर्य की आवश्यकता होती है। यह न्याय व्यवस्था के लिए एक निरंतर चुनौती है कि वह महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करते हुए, कानून के दुरुपयोग से बेकसूर नागरिकों को भी बचाए।
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